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कभी तन्हाईयों की सहेली है

कभी तन्हाईयों की सहेली है

कभी तन्हाईयों की सहेली है,
कभी टूटे ख़ाबों की हवेली है,
कभी बहते दरिया सी शांत है,
कभी इश्क़ में डूबी अलबेली है,
ये रात अनसुलझी इक पहेली है।
सितारों के लिबास में सजी हुई,
जैसे कोई दुल्हन नयी नवेली है,
न जाने कितनी दफा इसने,
मेरे संग आँखमिचौली खेली है,
ये रात अनसुलझी इक पहेली है।
कभी तन्हाईयों की सहेली है,
अधूरी ख्वाहिशों का ये खंडर है
मजबूरी के हालातों का समंदर है
कितना दर्द छिपाए अपने अंदर है
फिर भी कैसे मुस्कुराती अकेली है
ये रात अनसुलझी इक पहेली है।

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